
कुशीनगर में NHM के ‘रक्त’ पर भ्रष्टाचार की दीमक: 4.50 करोड़ का ‘कागजी’ खेल, पूर्व विधायक के भाई से ‘गठजोड़’ और रिटायरमेंट का ‘अंतिम दांव’
दवा माफिया के आगे नतमस्तक सिस्टम? कुशीनगर में NHM बजट पर डाका, डॉ. पटारिया का 'विदाई घोटाला' बेनकाब!
अजीत मिश्रा (खोजी)
विशेष खोजी रिपोर्ट: कुशीनगर स्वास्थ्य विभाग में ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ की जरूरत, भ्रष्टाचार के ‘डॉक्टरों’ ने निगल लिया 4.50 करोड़ का बजट
ब्यूरो रिपोर्ट: उत्तर प्रदेश (कुशीनगर)
- कुशीनगर स्वास्थ्य विभाग में ‘महाडकैती’: रिटायरमेंट की शाम 4.50 करोड़ का ‘कागजी’ खेल, पूर्व विधायक का भाई भी लपेटे में!
- सफेदपोश ‘लुटेरों’ ने निगल लिया गरीबों की सेहत का बजट; कुशीनगर में साढ़े चार करोड़ का टेंडर कांड!
- भ्रष्टाचार का ‘कैंसर’: कुशीनगर स्वास्थ्य विभाग में कागजों पर खरीदे गए उपकरण, पूर्व विधायक के सिंडिकेट से जुड़े तार!
- DM की सख्ती से थमा 4.50 करोड़ का ‘फर्जी’ भुगतान; डॉ. पटारिया के भ्रष्टाचार के ‘किले’ में लगी सेंध!
- रिटायरमेंट के दिन ‘रेवड़ी’ की तरह बांटी नौकरियां; कुशीनगर डीएम ने रद्द कीं 10 अवैध नियुक्तियां!
- SDM की जांच में उड़ी भ्रष्टाचारियों की नींद: कुशीनगर स्वास्थ्य विभाग में करोड़ों की खरीदारी की खुली पोल!
- साहब रिटायर हुए पर ‘मोह’ नहीं गया: 4.50 करोड़ के कमीशन के लिए पूर्व CMO ने दांव पर लगाई साख!
- UP स्वास्थ्य विभाग या ‘भ्रष्टाचार का अड्डा’? मुकेश श्रीवास्तव के सिंडिकेट पर कार्रवाई से क्यों कांपता है शासन?
- पर्दाफाश: कुशीनगर से शुरू हुआ ‘दवा माफिया’ की तबाही का काउंटडाउन, अब खुलेगी जिलेवार फाइल!
कुशीनगर/ लखनऊ।। उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य महकमे में भ्रष्टाचार की जड़ें कितनी गहरी हैं, इसका जीवंत प्रमाण कुशीनगर जिले से सामने आया है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन (NHM), जिसका उद्देश्य गरीबों तक बेहतर स्वास्थ्य सुविधा पहुँचाना है, यहाँ ‘भ्रष्टाचार का मिशन’ बन गया। जिले के पूर्व मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. सुरेश पटारिया के कार्यकाल के अंतिम वर्ष में 4.50 करोड़ रुपये की संदिग्ध खरीदारी का मामला अब एक बड़े राजनीतिक और प्रशासनिक बवंडर का रूप ले चुका है।
विदाई की बेला में ‘लूट’ की तैयारी?
आमतौर पर रिटायरमेंट के समय अधिकारी अपना बोरिया-बिस्तर समेटते हैं, लेकिन डॉ. पटारिया पर आरोप है कि वे करोड़ों की फाइलें ‘सेट’ कर रहे थे। जांच में सामने आया है कि सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC) और प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) के नाम पर जो दवाएं और उपकरण कागजों पर खरीदे गए, वे धरातल पर कहीं नज़र ही नहीं आ रहे। सूत्रों का दावा है कि यह पूरी खरीदारी महज एक ‘कागजी खानापूर्ति’ थी, ताकि सरकारी खजाने से साढ़े चार करोड़ रुपये की डकैती डाली जा सके।
जांच में खुले भ्रष्टाचार के ‘नग्न’ अध्याय
रिटायरमेंट के दिन ‘अपनों’ पर मेहरबानी: डॉ. पटारिया ने भ्रष्टाचार की हदें तब पार कर दीं, जब उन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के आखिरी दिन 10 चहेतों को आउटसोर्सिंग के जरिए नौकरी पर रख लिया। हालांकि, DM महेंद्र सिंह तंवर की सतर्कता ने इस फर्जीवाड़े पर पानी फेर दिया और नियुक्तियां रद्द कर दी गईं।
- हवा में हुई खरीदारी: वर्तमान CMO डॉ. चंद्रप्रकाश ने स्पष्ट किया है कि बिलों और सामान की वास्तविकता में जमीन-आसमान का फर्क है। जब तक सामान की मौजूदगी प्रमाणित नहीं होती, फूटी कौड़ी का भुगतान नहीं होगा।
- हाईकोर्ट की आड़ में ‘वसूली’ की कोशिश: ठेकेदार ने भुगतान के लिए कोर्ट का सहारा लेकर प्रशासन पर दबाव बनाने की कोशिश की, लेकिन SDM मोहम्मद जफर के नेतृत्व में बनी जांच टीम ने फिलहाल इस ‘लूट’ पर ब्रेक लगा दिया है।
सफेदपोश संरक्षण: पूर्व विधायक के भाई से ‘खास’ डील
इस घोटाले की आंच बहराइच तक पहुँच रही है। बताया जा रहा है कि डॉ. पटारिया ने नियम-कायदों को ताक पर रखकर बहराइच के रसूखदार पूर्व विधायक मुकेश श्रीवास्तव के भाई की फर्म को करोड़ों का टेंडर थमाया। मुकेश श्रीवास्तव, जिनका नाम पहले भी स्वास्थ्य विभाग के कई विवादों में उछल चुका है, उनके भाई की कंपनी के साथ हुई यह ‘डील’ सीधे तौर पर भ्रष्टाचार के सिंडिकेट की ओर इशारा करती है। आश्चर्य की बात यह है कि रिटायर होने के बाद भी डॉ. पटारिया विभाग के चक्कर काट रहे थे ताकि इस संदिग्ध फर्म का भुगतान जल्द से जल्द कराया जा सके।प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में मुकेश श्रीवास्तव का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। NRHM घोटाले के दागों के बावजूद, वह प्रदेश के दर्जनों जिलों में सीना तानकर सक्रिय है। सवाल यह है कि स्वास्थ्य मंत्री और प्रमुख सचिव जैसे ऊंचे पदों पर बैठे लोग इस सिंडिकेट के खिलाफ हंटर चलाने की हिम्मत क्यों नहीं जुटा पा रहे हैं? क्या यह ‘दवा माफिया’ व्यवस्था से भी ज्यादा ताकतवर हो चुका है?
डीएम की सख्ती ने बिगाड़ा खेल
भ्रष्टाचारियों ने इस बार जिला प्रशासन की सतर्कता को आंकने में चूक कर दी। कुशीनगर के डीएम महेंद्र सिंह तंवर के पास जब इस भारी-भरकम भुगतान की फाइल पहुँची, तो उन्हें दाल में कुछ काला नहीं बल्कि पूरी दाल ही काली नजर आई। डीएम ने तत्काल भुगतान पर रोक लगाते हुए एसडीएम मोहम्मद जफर के नेतृत्व में तीन सदस्यीय उच्च स्तरीय जांच टीम गठित कर दी।
जांच में अब तक के सबसे चौंकाने वाले बिंदु:
- अंतिम दिन की नियुक्तियां: डॉ. पटारिया ने अपनी विदाई वाले दिन ही नियम विरुद्ध तरीके से 10 चहेतों को आउटसोर्सिंग पर भर्ती कर दिया। इसे ‘रेवड़ी बांटने’ जैसा कृत्य माना गया और डीएम ने इसे तुरंत रद्द कर दिया।
- कागजी आपूर्ति: वर्तमान सीएमओ डॉ. चंद्रप्रकाश के निरीक्षण में स्टोर और अभिलेखों में भारी विसंगतियां मिली हैं। सामान की भौतिक मौजूदगी (Physical Presence) संदिग्ध है।
- कोर्ट को गुमराह करने की कोशिश: ठेकेदार ने भुगतान के लिए हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाया, लेकिन जिला प्रशासन की रिपोर्ट ने कोर्ट में भी इस सिंडिकेट की पोल खोलकर रख दी है।
दवा माफिया का ‘मकड़जाल’ और शासन की चुप्पी
मुकेश श्रीवास्तव का प्रभाव उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में किसी समानांतर सरकार जैसा है। एनआरएचएम घोटाले के गंभीर आरोपों के बाद भी प्रदेश के दर्जनों जिलों में उसकी फर्में सक्रिय हैं। सवाल उठना लाजमी है कि आखिर स्वास्थ्य मंत्री और प्रमुख सचिव जैसे जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग इस सिंडिकेट पर कार्रवाई करने से क्यों कतरा रहे हैं? क्या सत्ता के गलियारों में बैठे कुछ रसूखदार लोग इस ‘कमीशन के खेल’ के हिस्सेदार हैं?
सिंडिकेट का होगा पर्दाफाश
उत्तर प्रदेश के स्वास्थ्य विभाग में पिछले दो दशकों से दवा माफियाओं का एक ऐसा सिंडिकेट सक्रिय है, जो तय करता है कि किस जिले में कौन CMO बनेगा और बजट की बंदरबांट कैसे होगी। ‘पर्दाफाश’ की टीम अब जिलेवार इन माफियाओं की कुंडली खंगालने जा रही है। कुशीनगर तो बस एक शुरुआत है, पूरे प्रदेश में फैले इस भ्रष्टाचार के जाल की परतों को अब सार्वजनिक किया जाएगा।
“भ्रष्टाचार के खिलाफ ज़ीरो टॉलरेंस का दावा करने वाली सरकार के लिए कुशीनगर कांड एक खुली चुनौती है। देखना यह है कि क्या केवल छोटी मछलियों पर गाज गिरेगी या सफेदपोश मगरमच्छों तक भी कानून के हाथ पहुँचेंगे?”
जिलेवार होगा पर्दाफाश
कुशीनगर का यह मामला तो महज एक बानगी है। प्रदेश भर में फैले दवा माफियाओं का यह रैकेट सीएमओ और सीएमएस की पोस्टिंग से लेकर बजट के बंदरबांट तक का खेल रचता है। ‘पर्दाफाश’ की टीम अब इस सिंडिकेट के हर मोहरे को बेनकाब करेगी। अगले अंक में हम खुलासा करेंगे कि कैसे कुछ चुनिंदा फर्में ही पूरे प्रदेश के स्वास्थ्य बजट को अपनी जागीर समझकर लूट रही हैं।
जब रक्षक ही भक्षक बन जाएं, तो न्याय की उम्मीद किससे की जाए? कुशीनगर का साढ़े चार करोड़ का यह घोटाला मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के ‘जीरो टॉलरेंस’ के दावे की अग्निपरीक्षा है। क्या प्रशासन इन भ्रष्ट चेहरों को जेल भेजेगा या मामला ठंडे बस्ते में डाल दिया जाएगा? नजर बनी रहेगी।












